बचपन में स्कूल में मैंने दो बादलों की कहानी पढ़ी थी। एक काला और दूसरा सफ़ेद। काला बादल अपने जीवन का उत्कर्ष ढूंढ रहा था। सफ़ेद बादल को उत्कर्ष पहले ही प्राप्त हो चूका था। तो लेखक को यह सूचित करना था की मनुष्य का जीवन परोपकार की भावना से ओतप्रोत हो तो वह अपना उत्कर्ष स्वयं ही ढूंढ पाता है। यह कहानी मेरे मन में बसी हुई है इसलिए की जिस उम्र में मैंने यह पढ़ी थी तब अच्छाई और नेकी यह गुणविशेषताएँ हमें हमारे जीवन का सर्वोच्च परिमाण के रूप में बतलाई गयी थी। आज किसी गाने में मैंने 'एक भटकता बादल' यह लफ्ज़ सुने और मुझे बचपन की नेकी भरी वह सीख याद आयी। सच ही तो हैं के हम अपनी आस्था और अपने स्वभाव विशेष का मेल रखते हुए जीवन कंठित करते हैं। कोई भी नयी चीज़ अपनाते हुए पहले सहमे होते है और पुरानी चीज़ों को अलविदा करते हुए उतने ही भावुक। यही भाव तो हमें समूचे प्राणी जगत में सर्वश्रेष्ठ ठहराते है। कई बार अपनी स्मृतियों की गंगा में बहते हुए हम न जाने कितने ही साल, घंटे और लम्हें पार कर जाते है। जब यादें याद आती हैं, तब हम उन्हें एक तीसरे दायरे से देखते है। कई बार तो मैं किसी अनजान जगह पर खड़े ह...
"Some of the sweetest things in life are through greatest struggling battles"