Skip to main content

Posts

Showing posts with the label Amrita Pritam

इमरोज की कुछ कविताएँ

आज मैंने अमृता प्रीतम की कुछ कविता पंक्तियाँ अपने चुनिंदा दोस्तों को मेसेज कर दी फ़ोन पर। उनमें से मेरे प्रिय सखी ने कहा की उसे कविता में personification यह प्रकार बहुत भाता हैं। मैं बेहद प्रसन्न हो गयी, सुबह- सुबह। फिर अमृता प्रीतम से मुझे इमरोज याद आये। मैंने झट से इंटरनेट पर इमरोज की कविताएँ ढूंढ़ी। मन चाहा की सब लोग उन्हें पढ़ें। तो बस, उनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। हमउम्र ज़िंदगी खेलती है पर हमउम्रों से... कविता खेलती है बराबर के शब्दों से, ख़यालों से पर अर्थ खेल नहीं बनते ज़िंदगी बन जाते हैं... रात-दिन रिश्ते भी खेलते हैं सिर्फ़ मनचाहों से उम्रें कोई भी हों ज़िंदगी में मनचाहे रिश्ते अपने आप हमउम्र हो जाते हैं... सभ्यता इतिहास कहता है कि सभ्यता से पहले बंदा जंगली था, वहशी था पर १९४७ कह रहा है कि सभ्यता के बाद भी बंदा जंगली भी है और वहशी भी... रंग काले रंग को कभी भी कोई रंग नहीं रंगता... काली सोच को भी ज़िंदगी का कोई रंग नहीं रंगता... ज़िंदगी जीने लगो तो करना फूल ज़िंदगी के हवाले जाने लगो तो करना बीज धरती के हवाले...